सामूहिक चिंता क्योकि “लोकतंत्र का दंभ और तानाशाही” सामान अनुपात में बढ़ रहा है

राजिम@गरियाबंद :- आज भारत अपने राजनितिक आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है तब केंद्र व राज्यों के सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे राजनेता और अफसर ही नहीं सरकारी महकमे का हर अदना सा कर्मचारी भी तानाशाही का मूर्तरूप जान पड़ता है. उसपर दुर्भाग्य यह की उक्त सभी पावर में बैठे लोग लोकतंत्र का दंभ भी बराबर भरते देखे जा सकते है. चारो तरफ आप नजर घुमाइये आपको यह पाखंड स्पष्ट दिखाई देगा अपने वास्तविक और नग्न रूप में पूरी निर्लज्जता के साथ. और जब आप यह सब देख, जान और समझ लेंगे तब इस तथाकथित लोकतन्त्र जो वास्तव में भीड़तंत्र के ही चरित्र से संचालित है तो कोई रास्ता नहीं सूझेगा की क्या किया जावे. पूरा समाज निस्सहाय अवस्था में जीने मजबूर प्रतीत होता है. धनपतियो के हाथ में पूरा सिस्टम और पावर दिखाई पड़ता है. अच्छी शिक्षा और अच्छी चिकित्सा तक भारत में सर्व सुलभ नहीं रहा. धनपतियो का वहाँ भी कब्ज़ा और पकड़ स्पष्ट दिखता है. बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर का सपना फिर से सपना बन जाये ऐसा पूरा तंत्र मिलकर साजिश रचने में मशगूल दिखाई देता है. समाज का एक वर्ग को छोड़ दे तो आज पूरा देश इस बात से सहमत दिखाई पड़ेगा.

इसमें कोई दो मत नहीं रह गया है कि डॉ अम्बेडकर ने हमें जो संविधान दिया था उसमे समाज के सबसे नीचले तबके को भी बराबरी में ला खड़ा किया था बावजूद तानाशाही के इस नए दौर में हम वास्तविकताओं से मुह नहीं फेर सकते, आंखे नहीं बिचका सकते. यदि किसी को भी इस बात में कोई अतिशयोक्ति लगता है तो वह अपने सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ साथ प्रशासन में बैठे किसी भी सरकारी अधिकारी-कर्मचारी से रूबरू होकर देख ले. अनुभव वैसा ही कडवा होने वाला है जैसे इस पंक्ति के लेखक को अपने दैनदिन जीवन में होता आया है. वैसे बता दू कि मै निराशावादी व्यक्ति नहीं हू बावजूद सत्य को झुठलाया भी तो नहीं जा सकता है ना. तानाशाही के इस युग में लोग सच को सच कहने से भी बचने लगे है जो आज विचारणीय और चिंतनीय दशा है. सामाजिक संगठन तक तानाशाही के दौर से गुजर रहा है. लोकतंत्र आज दिखावा है क्योकि भारत में जो लोकतंत्र है वह चुनावी लोकतंत्र है. और यही आज का कटु सत्य भी है.

भारत जन्मजात लोकतांत्रिक देश रहा है लेकिन कालांतर में वर्ण व्यवस्था के कारण पिछले तीन हजार साल तक गुलामी शोषण और दमन के दौर से गुजरने और उससे आंशिक ही सही बाहर निकलने में सफल रहा है जो एक वर्ग विशेष को नहीं भा रहा है. हलांकि आज लोकतंत्र और स्वतंत्रता का नया दुश्मन वर्ण व्यवस्था ना होकर धन आधारित व्यवस्था की भेट चढ़ता जा रहा है. जो समाज और देश को रसातल में ले जाने उद्दत मालूम पड़ता है. सवाल है कि क्या समाज व्यवस्था हमेशा से ऐसा ही रहता आया है चाहे युग और समय कोई सा भी रहा हो ? जिसका उत्तर ढूँढना आज नितांत आवश्यक प्रतीत होता है.

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